कुर्सी से 'फेविकोल' सा जोड़: सालों से एक ही पटल पर जमे अधिकारी-कर्मचारी, ट्रांसफर नीति को दिखा रहे ठेंगा

कुर्सी से 'फेविकोल' सा जोड़: सालों से एक ही पटल पर जमे अधिकारी-कर्मचारी, ट्रांसफर नीति को दिखा रहे ठेंगा

विशेष संवाददाता, विशेष आलेख जशपुर कांसाबेल ऋषि संतोष थवाईत की कलम से 

तबादला नीतियां बनती ही इसलिए हैं ताकि सरकारी विभागों में पारदर्शिता बनी रहे, भ्रष्टाचार पर लगाम लगे और कामकाज में नयापन आए। लेकिन  आर ई एस, स्वास्थ्य आदि अन्य विभागें /कई जिलों में जैसे जशपुर एक उदाहरण के तौर पर कुनकुरी कांसाबेल अन्य क्षेत्रों में नियम-कायदों को ताक पर रखकर कई अधिकारी और कर्मचारी सालों से एक ही सीट पर 'कुंडली मारकर' बैठे हैं। हालत यह है कि सरकारें बदल गईं, बड़े साहब बदल गए, लेकिन इन बाबू और अफसरों की कुर्सी नहीं हिली।

'रसूख' के आगे नतमस्तक हुए नियम

​नियमानुसार, किसी भी संवेदनशील या महत्वपूर्ण पटल (सीट) पर किसी भी कर्मचारी को अमूमन 3 साल से अधिक नहीं रखा जाना चाहिए। इसके बाद उनका पटल परिवर्तन या स्थानांतरण अनिवार्य होता है। परंतु, प्रशासनिक सांठगांठ और राजनीतिक रसूख के बल पर कई रसूखदार कर्मचारी दशकों से मलाईदार सीटों पर जमे हुए हैं।

​विभागीय सूत्रों की मानें तो इन 'स्थायी' हो चुके प्रभारियों ने विभाग के भीतर अपना एक समानांतर नेटवर्क तैयार कर लिया है। नए आने वाले उच्च अधिकारियों को भी ये कर्मचारी अपने तरीके से 'गाइड' करते हैं, जिससे पूरा सिस्टम इनके इशारे पर नाचने को मजबूर है।

भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद को बढ़ावा

​एक ही जगह लंबे समय तक टिके रहने के कारण इन कर्मचारियों के स्थानीय दलालों, ठेकेदारों और बिचौलियों से गहरे संबंध बन जाते हैं। जनता के काम सीधे होने के बजाय इन 'खास' चैनलों के जरिए होते हैं।

नाम न छापने की शर्त पर एक जागरूक नागरिक ने बताया:

"जब भी हम किसी काम के लिए जाते हैं, तो सालों से वही चेहरा सीट पर दिखता है। उन्हें पता है कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। फाइल आगे बढ़ानी हो तो उनकी शर्तों पर ही काम करना पड़ता है।"

नई प्रतिभाओं और ईमानदार अफसरों की अनदेखी

​इस 'कुर्सी मोह' का सबसे बुरा असर उन ईमानदार और नए कर्मचारियों पर पड़ रहा है, जो अपनी योग्यता के बल पर आगे आना चाहते हैं। महत्वपूर्ण और मलाईदार टेबल हमेशा पुराने और मठाधीश किस्म के कर्मचारियों के कब्जे में रहने के कारण, नए विजन वाले अधिकारियों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है।

मुख्य बिंदु: आखिर क्यों नहीं हिलती इनकी कुर्सी?

  • जुगाड़ और सेटिंग: ट्रांसफर लिस्ट में नाम आते ही ऊपर तक सेटिंग कर नाम कटवा लेना।
  • मेडिकल और पारिवारिक बहाने: ट्रांसफर रुकवाने के लिए बीमारी या बच्चों की पढ़ाई का ढाल की तरह इस्तेमाल।
  • फाइलों का 'एकाधिकार': कुछ चालाक कर्मचारी काम को इस तरह उलझा कर रखते हैं कि उनके बिना विभाग का काम ठप होने का डर बना रहे।

जनता पूछ रही सवाल: कब चलेगा हंटर?

​अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उच्चाधिकारी और संबंधित मंत्रालय इन 'अमरपट्टा' लिखवाकर बैठे कर्मचारियों के खिलाफ कोई सख्त कदम उठाएंगे? क्या कभी इन विभागों में निष्पक्ष रोटेशन पॉलिसी लागू होगी, या फिर व्यवस्था इसी तरह चंद रसूखदारों के रहमों-करम पर चलती रहेगी? जनता को अब किसी बड़े और कड़े प्रशासनिक फैसले का इंतजार है।