गौरव पथ निर्माण में बड़े 'खेल' की बू: चहेते ठेकेदार को उपकृत करने बदला जा रहा PQ, क्या सीधे वर्क ऑर्डर जारी करने से डर रहा विभाग?

गौरव पथ निर्माण में बड़े 'खेल' की बू: चहेते ठेकेदार को उपकृत करने बदला जा रहा PQ, क्या सीधे वर्क ऑर्डर जारी करने से डर रहा विभाग?

जशपुर बगीचा (विशेष संवाददाता)। नगर पंचायत बगीचा में 10.50 करोड़ रुपये की लागत से स्वीकृत गौरव पथ निर्माण कार्य अब भ्रष्टाचार और विभागीय मिलीभगत के दलदल में फंसता नजर आ रहा है। विभाग के आला अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए स्थानीय ठेकेदारों ने सीधे विभागीय सचिव से न्याय की गुहार लगाई है, साथ ही मांग पूरी न होने पर उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) का दरवाजा खटखटाने की चेतावनी दी है।

तीन बार रद्द, चौथी बार में चहेते के लिए बदला 'नियम'

​मामला करीब 5 महीने पहले स्वीकृत हुए गौरव पथ का है। आरोप है कि विभागीय अधिकारियों ने पहले से ही तय कर लिया है कि यह काम किस 'खास' ठेकेदार को देना है। इसी सेटिंग के तहत मेसर्स विनोद कुमार जैन (M/s Vinod Kumar Jain) को लाभ पहुंचाने के लिए प्री-क्वालिफिकेशन (PQ) के नियमों को बार-बार बदला जा रहा है।

​हैरानी की बात यह है कि इस कार्य के लिए अलग-अलग PQ शर्तों के साथ तीन बार टेंडर निकाला और रद्द किया जा चुका है। अब चौथी बार (4th Tender) निकाला गया है, जिसमें एक ऐसी शर्त जोड़ दी गई है जो सिर्फ और सिर्फ उक्त चहेते ठेकेदार के पास ही उपलब्ध है।

क्या है नया 'शर्त-घोटाला'?

​चौथे टेंडर में शर्त रखी गई है कि ठेकेदार के पास विगत 05 वर्षों में 'बीटी रोड' वाले गौरव पथ निर्माण का ही अनुभव होना चाहिए। स्थानीय ठेकेदारों का कहना है कि पूरे क्षेत्र में यह विशिष्ट अनुभव केवल मेसर्स विनोद कुमार जैन के पास है। ऐसे में अन्य पात्र ठेकेदारों को रेस से बाहर करने के लिए मुख्य अभियंता (Chief Engineer) के स्तर पर यह बकायदा प्लानिंग के तहत किया गया फर्जीवाड़ा है।

"अगर सरकार और विभाग ने पहले ही तय कर लिया है कि काम किसे देना है, तो बार-बार टेंडर की नौटंकी करके सरकारी राजस्व और समय क्यों बर्बाद किया जा रहा है? विभाग को चाहिए कि सीधे-सीधे अपने चहेते ठेकेदार को वर्क ऑर्डर जारी कर दे।"

पीड़ित स्थानीय ठेकेदार

मुख्य अभियंता की भूमिका पर गंभीर सवाल

​शिकायतकर्ताओं ने सीधे तौर पर विभाग के मुख्य अभियंता (सीई) की मिलीभगत का आरोप लगाया है। बताया जा रहा है कि इस विसंगति और नियम विरुद्ध बनाई गई शर्तों के संबंध में मुख्य अभियंता को कई बार लिखित और मौखिक रूप से अवगत कराया गया, लेकिन उन्होंने आंखें मूंद रखी हैं। अफसरों की यह चुप्पी साफ़ इशारा करती है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।

जिम्मेदार अधिकारी बोले— "जानकारी नहीं है, फाइल मंगवाई है"

​इस गंभीर और संवेदनशील मामले को लेकर जब हमने नगरीय प्रशासन रायपुर के चीफ इंजीनियरिंग राजेश शर्मा से संपर्क किया, तो उन्होंने मामले में अनभिज्ञता जाहिर की। ईई राजेश शर्मा ने कहा:

"अभी मुझे इस संबंध में पूरी जानकारी नहीं है, इसलिए मैं अभी कुछ नहीं बता सकता। मैंने जूनियर इंजीनियर (JE) से इस पूरे मामले की फाइल मंगवाई है। टेंडर और शर्तों की फाइल देखने और उसका परीक्षण करने के बाद ही मैं कुछ बता पाने की स्थिति में हूँगा।"

​अधिकारी का यह जवाब साफ बताता है कि निचले स्तर पर चल रहे इस 'खेल' की फाइलें अब आला अफसरों के टेबल तक पहुंचने लगी हैं, लेकिन देखना यह होगा कि फाइल देखने के बाद क्या इस गड़बड़ी पर रोक लगती है या लीपापोती कर दी जाती है।

न्याय न मिलने पर अब 'हाई कोर्ट' की शरण

​पीड़ित स्थानीय निवासियों और ठेकेदारों ने आदरणीय सचिव महोदया को पत्र लिखकर इस पूरे टेंडर घोटाले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। साथ ही दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि विभाग इस फर्जीवाड़े को नहीं रोकता और स्थानीय ठेकेदारों को समान अवसर नहीं देता, तो वे इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ नगर निकाय और विभाग को पार्टी बनाते हुए माननीय हाई कोर्ट में याचिका दायर करेंगे।

​अब देखना यह है कि इस गंभीर शिकायत के बाद सचिव महोदया भ्रष्ट अफसरों और चहेते ठेकेदार के इस गठजोड़ पर क्या कार्रवाई करती हैं।